इस दुनिया की सच्ची कहानियां ,जिन पर यक़ीन करना मुश्किल लगता है।हालांकि ये इसी दुनिया की तमाम कहानियों में एक अविस्मरणीय कहानी है।फरवरी 1943 की सर्द सुबह में, बोसांस्का क्रुपा में, जो बोस्निया के उत्तर पश्चिम में उना नदी के किनारे बसा एक छोटा शहर है, एक 17 साल की लड़की फांसी के तख्ते पर खड़ी थी। जर्मन सैनिक और उनके सहयोगी उस्ताशे उसे घेरे हुए थे, मगर उसकी आँखों में डर की जगह साहस झलक रहा था। उसका नाम था लेपा रेडिच, एक ऐसी लड़की जिसकी कहानी आज भी दिलों को झकझोर देती है।
1925 में बोस्निया के गास्निका में जन्मी लेपा एक होनहार छात्रा थी। उसका दिल अपने देश और लोगों के लिए धड़कता था। 15 साल की उम्र में उसने कम्युनिस्ट विचारधारा को अपनाया, क्योंकि वह अत्याचार के खिलाफ लड़ना चाहती थी। 1941 में, जब वह सिर्फ 15 की थी, नाजियों और उनकी सहयोगी एक्सिस शक्तियों ने युगोस्लाविया पर हमला किया। जर्मनी, इटली और अन्य ने मिलकर देश को टुकड़ों में बाँट दिया। सर्बिया जर्मनों के कब्जे में चला गया, जबकि बोस्निया और क्रोएशिया उस्ताशे के क्रूर शासन के अधीन हो गए।
बोसांस्का क्रुपा भी इस दमन का शिकार बना। इस अंधेरे समय में लेपा ने युगोस्लाव पार्टिसन्स का साथ चुना।पार्टिसन्स बहादुर लोग थे, जो जंगलों और पहाड़ों से नाजियों और उस्ताशे के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध लड़ रहे थे। उनका सपना था युगोस्लाविया को आजादी दिलाना।
लेपा ने नर्स के रूप में घायलों की देखभाल की और संदेशवाहक बनकर खतरनाक मिशनों में हिस्सा लिया। उसका जुनून हर कदम पर दिखता था।1943 में बोस्निया की नेरेटवा की लड़ाई एक निर्णायक जंग थी। नाजियों और उस्ताशे ने पार्टिसन्स को घेर लिया था।
इस लड़ाई में पार्टिसन्स ने नेरेटवा नदी पार कर हजारों घायल लड़ाकों और नागरिकों को बचाया। लेपा ने गोलियों की बौछार के बीच नागरिकों को सुरक्षित निकालने की कोशिश की। मगर इस साहस ने उसे जर्मनों के हत्थे चढ़ा दिया।
जर्मन अधिकारियों ने उसे एक मौका दिया। उन्होंने कहा कि अपने साथी पार्टिसन्स के नाम बता दे, तो वह जिंदा रह सकती है। लेपा ने सिर उठाया और कहा कि मैं अपने लोगों के साथ विश्वासघात नहीं करूंगी। जिनके बारे में तुम पूछ रहे हो, वे मेरा बदला लेते समय खुद सामने आएंगे। उसकी आवाज़ में न डर था, न झिझक।जल्द ही उसे फांसी दे दी गई।
उसकी आखिरी तस्वीर, जिसमें वह रस्सी के साथ सिर ऊँचा किए खड़ी थी, साहस की जीवंत मिसाल है। 1951 में युगोस्लाविया ने उसे मरणोपरांत ‘ऑर्डर ऑफ द पीपल्स’ हीरो से सम्मानित किया।