शारदीय नवरात्रि के चौथे दिन (चतुर्थी तिथि) भगवती दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप माँ कुष्मांडा की उपासना की जाती है। अपनी मंद, हल्की मुस्कान (ईषत् हास्य) से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें ‘कुष्मांडा’ कहा गया है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और चारों ओर केवल अंधकार ही अंधकार था, तब देवी कुष्मांडा ने ही अपने उदर से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसलिए इन्हें सृष्टि की आदिस्वरूपा या आदिशक्ति भी कहा जाता है।
माँ कुष्मांडा की उपासना से साधक को आरोग्य, दीर्घायु, यश और बल की प्राप्ति होती है।
1. माँ कुष्मांडा का स्वरूप और महत्व
माँ कुष्मांडा का निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में माना जाता है। केवल इन्हीं में सूर्यलोक में निवास करने की क्षमता है, और इनके शरीर की कांति व प्रभाव सूर्य के समान ही देदीप्यमान है।
- अष्टभुजा देवी: माँ कुष्मांडा की आठ भुजाएँ हैं। इनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतकलश, चक्र, गदा और सभी सिद्धियों-निधियों को देने वाली जपमाला सुशोभित है।
- सवारी: देवी की सवारी सिंह है और इन्हें कुम्हड़े (कद्दू/पेठा) की बलि अत्यंत प्रिय है, जिसे संस्कृत में ‘कुष्मांड’ कहा जाता है।
2. माँ कुष्मांडा पूजा विवरण (Key Overview)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| देवी स्वरूप | माँ कुष्मांडा (चतुर्थ नवदुर्गा) |
| तिथि | अश्विन शुक्ल चतुर्थी |
| शुभ रंग (Navratri Colour) | पीला (Yellow) या नारंगी (Orange) |
| प्रिय पुष्प | पीले कमल या लाल गुड़हल के फूल |
| मुख्य भोग | मालपुआ (देसी घी में बना) व हलवा |
| मुख्य मंत्र | ॐ देवी कूँष्माण्डायै नमः॥ |
3. माँ कुष्मांडा का प्रिय भोग और शुभ रंग
- प्रिय भोग: माँ कुष्मांडा को मालपुए का भोग अत्यंत प्रिय है। नवरात्रि के चौथे दिन देवी को मालपुए का नैवेद्य लगाने से बुद्धि का विकास होता है और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
- शुभ रंग: इस दिन पूजा में पीले (Yellow) या नारंगी (Orange) रंग के वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। पीला रंग आरोग्य, ऊर्जा और सुख-समृद्धि का प्रतीक है।
4. माँ कुष्मांडा की पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
- स्नान व संकल्प: प्रातःकाल उठकर स्नान करें और पीले रंग के वस्त्र धारण करें।
- आवाहन व पूजन: सबसे पहले गणेश जी और कलश देवता का पूजन करें, फिर माँ कुष्मांडा का ध्यान करें।
- श्रृंगार व पुष्प: देवी को रोली, अक्षत, केसर, चंदन और पीले कमल या लाल पुष्प अर्पित करें।
- नैवेद्य अर्पित करें: माँ को देसी घी में बने मालपुए या पेठे का भोग लगाएं।
- मंत्र जाप व आरती: देवी के ध्यान मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें। इसके बाद माँ कुष्मांडा की आरती गाकर परिवार में प्रसाद बांटें।
5. माँ कुष्मांडा मंत्र (Mantras)
ध्यान मंत्र:
वन्दे वांछित कामारथे चंद्रार्घकृत शेखराम।
सिंहरूढा अष्टभुजा कुष्मांडा यशस्विनीम॥
स्तुति मंत्र:
या देवी सर्वभूतेषु माँ कूँष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
बीज मंत्र:
ॐ देवी कूँष्माण्डायै नमः॥
6. पौराणिक व्रत कथा (Vrat Katha)
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब यह सृष्टि अस्तित्वहीन थी और चारों ओर केवल घना अंधकार फैला हुआ था, तब कोई ग्रह, नक्षत्र या जीवन नहीं था। उस समय देवी दुर्गा ने अपने मंद हास्य (मुस्कान) से एक छोटे से दिव्य अंडे (पिंड) को जन्म दिया। देवी की इस मुस्कान से उत्पन्न ऊर्जा से अंधकार समाप्त हो गया और संपूर्ण ब्रह्मांड प्रकाशमान हो उठा।
इसके बाद देवी ने सूर्यलोक में प्रवेश कर संपूर्ण दिशाओं को अपने तेज से आलोकित किया। उन्होंने ही त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) तथा अन्य देवी-देवताओं की रचना की। क्योंकि देवी ने अपनी ईषत् मुस्कान से अंड (ब्रह्मांड) को उत्पन्न किया और इन्हें कुष्मांड (कद्दू) की बलि प्रिय है, इसलिए इन्हें माँ कुष्मांडा के नाम से जाना गया। जो भक्त नवरात्रि के चौथे दिन निष्कपट मन से इनकी पूजा करता है, उसके समस्त रोग और शोक नष्ट हो जाते हैं।




