आखिरी चिट्ठी

आखिरी चिट्ठी

शहर के पुराने हिस्से में एक छोटी-सी चाय की दुकान थी। दुकान के बाहर लकड़ी की एक बेंच थी, जिस पर हर शाम एक बूढ़ा आदमी आकर बैठता था।

उसका नाम था रामदीन।

वह रोज़ ठीक पाँच बजे आता, एक कुल्हड़ चाय मंगवाता और सड़क के उस पार बने पुराने डाकखाने को देखता रहता।

चायवाला कई बार पूछ चुका था, “बाबा, किसका इंतज़ार करते हो?”

रामदीन मुस्कुरा देता।

“एक चिट्ठी का।”

“आजकल चिट्ठी कौन भेजता है?”

रामदीन ने चाय की आखिरी चुस्की लेते हुए कहा, “जिसे सच में कुछ कहना हो, वह कोई न कोई रास्ता ढूंढ ही लेता है।”

चायवाला हंसकर बात टाल देता।

लेकिन रामदीन सचमुच इंतज़ार करता था।

बीस साल पहले उसका बेटा अर्जुन घर छोड़कर शहर चला गया था।

जाते समय दोनों में बहुत बड़ा झगड़ा हुआ था।

अर्जुन ने कहा था, “आपको मुझ पर कभी भरोसा ही नहीं रहा।”

रामदीन ने गुस्से में जवाब दिया था, “जब दुनिया तुम्हें ठोकर मारेगी, तब समझोगे कि बाप क्या कह रहा था।”

अर्जुन चला गया।

दरवाज़ा बंद हुआ और रामदीन ने पहली बार महसूस किया कि कुछ शब्द गुस्से में बोल दिए जाते हैं, लेकिन उनकी आवाज़ बहुत लंबे समय तक घर में गूंजती रहती है।

पहले साल अर्जुन की एक चिट्ठी आई।

फिर दूसरी।

रामदीन ने दोनों चिट्ठियां पढ़ीं, लेकिन जवाब नहीं दिया।

उसका अहंकार कहता था, “पहले वह माफी मांगे।”

समय बीतता गया।

चिट्ठियां आना बंद हो गईं।

फिर एक दिन रामदीन को पता चला कि अर्जुन दूसरे शहर में नौकरी करता है, शादी कर चुका है और उसका एक छोटा बेटा भी है।

उसने किसी से कुछ नहीं कहा।

बस अगले दिन से वह रोज़ डाकखाने के सामने बैठने लगा।

उसे खुद नहीं पता था कि वह किसका इंतज़ार कर रहा है।

एक शाम डाकिया उसके पास आया।

उसके हाथ में एक पुराना-सा लिफाफा था।

“रामदीन जी?”

रामदीन की उंगलियां कांप गईं।

लिफाफे पर नाम लिखा था, अर्जुन।

उसने धीरे से चिट्ठी खोली।

अंदर सिर्फ चार पंक्तियां थीं।

“बाबा,

मुझे नहीं पता आप अभी भी मुझसे नाराज़ हैं या नहीं। लेकिन मैं अपने बेटे को जब भी डांटता हूं, आपकी आवाज़ याद आती है। अब समझ आता है कि आपकी चिंता गलत नहीं थी, बस आपका तरीका थोड़ा कठोर था।

मैं अगले रविवार घर आ रहा हूं। अगर दरवाज़ा खुला हो तो अंदर आ जाऊंगा।

अर्जुन।”

रामदीन बहुत देर तक चुप बैठा रहा।

फिर उसने चिट्ठी को सीने से लगा लिया।

अगले रविवार सुबह उसने घर का दरवाज़ा खुला छोड़ दिया।

दोपहर तक कोई नहीं आया।

शाम होने लगी।

रामदीन बार-बार बाहर देखता।

फिर सड़क के मोड़ पर एक आदमी दिखाई दिया।

उसके साथ एक छोटा बच्चा था।

रामदीन उठने की कोशिश में लड़खड़ा गया।

अर्जुन दौड़कर उसके पास आया।

दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

बीस साल की नाराज़गी के पास उस पल कहने के लिए कोई शब्द नहीं था।

अर्जुन ने बस इतना कहा,

“बाबा।”

रामदीन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“बहुत देर कर दी बेटा।”

अर्जुन की आंखें भर आईं।

“आपने भी तो दरवाज़ा बहुत देर से खोला।”

रामदीन मुस्कुराया।

“इस बार खुला रहने दूंगा।”

और शायद यही जिंदगी का सबसे कठिन सबक है।

हम अक्सर माफी मांगने से इसलिए रुक जाते हैं क्योंकि हमें लगता है कि सामने वाला पहले झुके।

फिर समय बीत जाता है।

लोग दूर चले जाते हैं।

और एक दिन समझ आता है कि बहस में जीतने के लिए जिस रिश्ते को हमने खो दिया, उसकी कीमत जीत से कहीं ज्यादा थी।

कुछ दरवाज़े समय रहते खोल देना चाहिए।

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