एक शहर जो रुकना नहीं चाहता
भारत के अधिकतर शहरों में हर सौ मीटर पर एक सिग्नल है और हर सिग्नल पर एक रुकावट। कभी लाल बत्ती, कभी जाम, कभी हॉर्नों का शोर, कभी झुंझलाहट।
लेकिन राजस्थान का कोटा, जो अब तक अपनी कोचिंग इंडस्ट्री और विद्यार्थियों की कहानियों से जाना जाता था, अब सिग्नल-फ्री शहर बनकर एक नई कहानी लिख रहा है “जहाँ ट्रैफिक चलता है, रुकता नहीं।”
जब सिग्नल हटते हैं, तब सोच बदलती है
कोटा में ट्रैफिक सिग्नल हटाना एक तकनीकी प्रयोग भर नहीं था। यह एक मानसिक प्रयोग था, नागरिकों पर भरोसा करने का।
सरकार ने शहर के प्रमुख चौराहों को फिर से डिज़ाइन किया,
फ्लाईओवर और अंडरपास बनाए,
राउंडअबाउट्स से रास्तों को सरल किया,
और नागरिकों से कहा — “अब तुम खुद समझो।”
यह कहना आसान नहीं था, क्योंकि भारतीय ट्रैफिक को हम अक्सर “अनियंत्रित” मानते हैं। लेकिन कोटा ने दिखाया कि जब योजना साफ हो और भरोसा ईमानदार, तो सड़कें अनुशासन सीख लेती हैं।
योजना में छिपी सादगी
इस व्यवस्था की खूबसूरती इसकी सादगी में है:
- हर चौराहा सिग्नल के बिना काम करता है।
- वाहन प्रवाह निरंतर रहता है।
- सड़कों की चौड़ाई और दिशाएँ ऐसी हैं कि रुकावट की संभावना न्यूनतम हो।
- फ्लाईओवर, अंडरपास और डिवाइडर मिलकर पूरे ट्रैफिक को एक लय देते हैं।
इससे शहर का समय बचता है, ईंधन बचता है, प्रदूषण कम होता है, और सबसे अहम लोगों का धैर्य बढ़ता है।
यह सिर्फ सड़क की बात नहीं, मानसिकता की भी है
सिग्नल हटाना केवल इंजीनियरिंग नहीं है यह सामाजिक अनुशासन की परीक्षा है।
अब जिम्मेदारी मशीन की नहीं, मनुष्य की है। अब निर्णय “लाल” या “हरी” बत्ती नहीं लेती बल्कि ड्राइवर का विवेक लेता है।
इसलिए कोटा का मॉडल हमें सिखाता है कि आधुनिकता सिर्फ तकनीक से नहीं आती, वह आत्म-नियंत्रण से आती है।
सतत विकास और स्मार्ट सिटी का असली अर्थ
स्मार्ट सिटी का मतलब सिर्फ सीसीटीवी और डिजिटल पैनल नहीं होता। स्मार्ट सिटी वह है जहाँ:
- ट्रैफिक अपने आप चलता है,
- ऊर्जा व्यर्थ नहीं होती,
- सड़कें भीड़ नहीं, समझ से भरती हैं।
कोटा का सिग्नल-फ्री मॉडल इस मायने में सतत (sustainable) है —
यह बिजली बचाता है,
समय बचाता है,
और मानसिक शांति लाता है।
इसके पीछे की अर्थव्यवस्था
सिग्नल लगाना आसान है, लेकिन उनका रखरखाव महँगा। हर सिग्नल को बिजली चाहिए, केबल चाहिए, तकनीशियन चाहिए। छोटे शहरों के लिए यह एक सतत खर्च है।
कोटा ने इस खर्च को डिज़ाइन में निवेश से बदल दिया। यानि, एक बार सड़क और चौराहा सही बना दो फिर सालों तक सुविधा अपने आप काम करेगी। यह है आर्थिक समझदारी।
क्यों लोगों को यह जानना चाहिए
क्योंकि यह सिर्फ कोटा की कहानी नहीं है यह भारत के छोटे और मझोले शहरों के भविष्य की दिशा है।
हमारे अधिकतर शहर अब उसी मोड़ पर हैं जहाँ भीड़ बढ़ रही है, पर संसाधन सीमित हैं। जहाँ ट्रैफिक लाइट्स लगाना आसान लगता है,
पर सोच बदलना मुश्किल।
कोटा ने यह मुश्किल काम किया है। उसने बताया कि “शहर की तरक्की, उसके अनुशासन में छिपी है।”
आगे क्या?
भारत के सैकड़ों छोटे शहर कोटा से सीख सकते हैं कैसे सिग्नल की जगह संकल्प लगाया जा सकता है। कैसे “रुकावट” की जगह “प्रवाह” को प्राथमिकता दी जा सकती है। और कैसे स्मार्ट सिटी बनने का अर्थ मानवीय समझदारी से जुड़ा हो सकता है, ना कि केवल डिजिटल गजट्स से।
निष्कर्ष
कोटा की सड़कों ने हमें एक सादा लेकिन गहरा सबक दिया है —
“जहाँ अनुशासन है, वहाँ सिग्नल की जरूरत नहीं।”
यह लेख इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि शहरों की पहचान उनकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उनकी सोच और सहमति से होती है।
कोटा ने सिग्नल हटाए, लेकिन समाज को एक नई दिशा दे दी जहाँ सड़कें सिर्फ रास्ते नहीं, बल्कि सभ्यता की परीक्षा हैं।




