राजस्थान के छात्र-नगर Kota ने एक अनूठी नीति अपनाई है यह भारत का पहला ऐसा ऐसा शहर माना जा रहा है जहाँ ट्रैफिक सिग्नल यानी लाल-हरी बत्तियाँ (traffic lights) लगभग पूरी तरह से हटाई गई हैं। यह बदलाव सिर्फ “नए-टेक ट्रैफिक लाइट्स हटाना” नहीं है- बल्कि एक सम्पूर्ण सड़क और ट्रैफिक प्रबंधन रणनीति का हिस्सा है, जिसमें फ्लाईओवर, अंडरपास, राउंडऐबाउट्स, बेहतर मार्गनिर्देशन और ट्रैफिक प्रवाह का डिज़ाइन शामिल है।
क्यों यह लेख महत्वपूर्ण है
- हमें शहर-योजना के नए तरीके जानने चाहिए: कैसे एक मध्यम-शहर (small to medium city) बड़ी-बड़ी मेट्रो शहरों की नकल न करके, स्वतंत्र समाधान अपना सकता है।
- ट्रैफिक सिग्नल हटाने का मतलब सिर्फ लाल-बत्ती हटाना नहीं यह शहर की गति, लोगों की सुविधा, अर्थव्यवस्था और जीवन-गुणवत्ता से जुड़ा है।
- यदि Kota जैसा मॉडल सफल हो सकता है, तो अन्य छोटे या मिड-साइज़ शहरों के लिए प्रतिरूप (template) बन सकता है कम बजट, बेहतर प्रवाह, कम इंतजार, कम प्रदूषण।
- आम नागरिकों, शहरी योजनाकारों, इंजीनियरों और नीति निर्माताओं को यह जानना चाहिए कि “लाइट रहित ट्रैफिक व्यवस्था” का क्या मतलब है, क्या चुनौतियाँ हैं, और इसे कैसे बेहतर किया जा सकता है।
क्या हुआ है Kota में?
सिग्नल हटाने की प्रक्रिया
- Kota में ट्रैफिक लाइट्स का उपयोग न्यूनतम स्तर पर किया गया है शहर ने सरकारी जानकारी के अनुसार “भारत का पहला सिग्नल फ्री शहर” होने का दावा किया है।
- इसके स्थान पर शहर ने बड़े फ्लाईओवर, अंडर पास और चौराहों पर हाईटेक मार्गनिर्देशन प्रणालियाँ लगाई हैं ताकि वाहन और पैदल यात्री बिना बहुत रुके आगे बढ़ सकें।
- ट्रैफिक का डिज़ाइन इस तरह से है कि चौराहों पर ट्रैफिक जैम कम हो, “स्टॉप-गो” कम हो और गति निरंतर बनी रहे।
परिणाम
- शुरुआत में कुछ बदलाव और समायोजन की आवश्यकता पड़ी, लेकिन रिपोर्ट्स के अनुसार वाहन प्रवाह बेहतर हुआ, जैम कम हुए और प्रतीक्षा-समय घटा।
- शहर की ट्रैफिक व्यवस्था अधिक प्रवाह-मुखी (flow-oriented) बनी वाहन निकालने-और-रुकने की जगह चलता-रहने पर आधारित।
- एक नीति-सुझाव के रूप में, Kota का मॉडल “शहर जहां ट्रैफिक लाइट नहीं लगे हैं” का उदाहरण बन गया है।

क्यों यह मॉडल काम कर सकता है — और किन कारणों से
फायदे
- बेहतर ट्रैफिक प्रवाह — सिग्नल नहीं होने से चौराहों पर वाहन रुकना कम होता है, जिससे समय की बचत होती है।
- कम शोर व कम विघटन — बार-बार लाल-हरी बत्ती पर रुकने से इंजन बंद-खोल, क्लच बदलने आदि से आवाज, धुआँ व तनाव बढ़ता है; इसे कम किया जा सकता है।
- कम ऊर्जा व रख-रखाव खर्च — ट्रैफिक लाइट्स के रख-रखाव, बिजली आदि का खर्च कम होता है।
- शहर-योजना के पक्ष में संकेत — फ्लाईओवर, अंडरपास व बेहतर चौराहों का निर्माण शहर को लंबे समय में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर देता है।
- उदाहरण बनना — अन्य शहरों को प्रेरणा मिल सकती है कि “हमें सिग्नल्स के बिना भी कार्य-प्रवाह कैसे बेहतर हो सकता है”।
चुनौतियाँ व सावधानियाँ
- उपयुक्त डिज़ाइन की आवश्यकता: सिर्फ लाइट्स हटा देना पर्याप्त नहीं चौराहों, फ्लाईओवरों, अंडरपस्सेस और मार्ग संकेतों का सही डिज़ाइन होना ज़रूरी है।
- मानव व्यवहार व नियम-पालन: यदि ड्राइवर, पैदल यात्री व साइकिल सवार नियम नहीं मानते, तो बिना सिग्नल के व्यवस्था गड़बड़ हो सकती है।
- ट्रैफिक व घनी आबादी वाली सीमाओं में: बड़े-बड़े शहरों में जहाँ ट्रैफिक बहुत जटिल है, ऐसा मॉडल उतनी आसानी से काम नहीं कर सकता।
- पैदल व साइकिल यातायात का ध्यान: सिग्नल हटाने से पैदल यात्रियों या साइकिल चालकों की सुरक्षा पर असर हो सकता है।
- डेटा व सुदृढ़ निगरानी: यह जरूरी है कि परिणामों को मापा जाए (जैसे प्रतीक्षा-समय, दुर्घटनाएँ, वाहन-गति) ताकि सुधार हो सके।
Kota से सीखने योग्य बातें — भारत के अन्य शहरों के लिए सुझाव
1. शुरुआती ज़ोन चुनें
जहाँ ट्रैफिक घनत्व बहुत अधिक नहीं है, वहाँ पहले इस तरह का मॉडल अपनाएँ फिर धीरे-धीरे विस्तार करें।
2. चौराहों का पुनर्गठन करें
राउंडऐबाउट्स, फ्लाईओवर, अंडरपास, संकेत बोर्ड और मार्ग विभाजन ऐसी व्यवस्था करें कि सिग्नल की जगह वाहन सहज आगे बढ़ सकें।
3. पैदल व साइकिल यातायात सुरक्षित करें
सिग्नल हटाने से पैदल यात्रियों के लिए कुछ अतिरिक्त सावधानी चाहिए उदाहरण के लिए, फ्लाईओवर के नीचे पैदल क्रॉसिंग, शेल्टर आदि।
4. नियम-पालन व जागरूकता
ड्राइवर, यात्री व नागरिकों को इस नई व्यवस्था के बारे में जागरूक करें क्योंकि व्यवस्था तभी काम करेगी जब लोग उसके अनुरूप चलें।
5. मापन व सुधार
नियमित रूप से ट्रैफिक डेटा (गति, प्रतीक्षा-समय, दुर्घटना-रहित घंटे) इकठ्ठा करें और सुधार के लिए उपयोग करें।
6. लागत-लाभ विश्लेषण
शुरुआती खर्च (फ्लाईओवर, अंडरपास, संकेत बोर्ड) अधिक हो सकते हैं, लेकिन लम्बे समय में सिग्नल, बिजली व रुकावट-लागत में कमी आएगी।
निष्कर्ष
Kota का “सिग्नल-रहित” ट्रैफिक मॉडल दिखाता है कि निरंतर रुकने-और-चलने (stop-go) की जगह, दौड़ते-रहने (flow) वाली व्यवस्था कैसे काम करता है विशेष रूप से छोटे-मध्यम शहरों में जहाँ ट्रैफिक अभी इतना जटिल नहीं-हो। यह मॉडल सिर्फ ट्रैफिक लाइट हटाने का नहीं है, बल्कि शहर-योजना, नागरिक व्यवहार, इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण और निगरानी-समर्थन का मिश्रण है।
यदि आप-रेADER या शहरी योजनाकार हैं तो यह जानना व समझना ज़रूरी है कि ट्रैफिक लाइट हटाना सूनियोजित रूप से, साझा जिम्मेदारी के साथ किया जाए न कि सिर्फ एक दिखावटी कदम के रूप में। अगर सही तरह से लागू किया जाए, यह नीति-प्रेरणा भारत के कई अन्य शहरों के लिए व्यापक लाभ का स्रोत बन सकती है कम जाम, कम इंतजार, बेहतर गति और बेहतर जीवन-गुणवत्ता।




