बांग्लादेश में इन दिनों जो कुछ हो रहा है, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। दिसंबर 2025 में मयमनसिंह के भालुका इलाके में एक निर्दोष हिंदू युवक दीपू चंद्र दास (25 वर्षीय गारमेंट फैक्ट्री मजदूर) को महज एक झूठे ब्लास्फेमी आरोप पर भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला, उसके शव को पेड़ से लटकाया और जिंदा जलाकर राख कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार, दर्जनों लोग इस बर्बरता को देखते और जश्न मनाते रहे।
यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है – यह बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ बढ़ते कट्टरपंथ और हिंसा का प्रतीक है। अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस ने इसकी निंदा की और 12 आरोपियों की गिरफ्तारी का दावा किया, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों हो रही हैं और विश्व समुदाय क्यों चुप है?
बांग्लादेश में हिंदू आबादी का इतिहास ही इस उत्पीड़न की गवाही देता है। 1947 के विभाजन से पहले पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में हिंदू 28-33% थे। 1951 में यह 22% हो गई, 1974 में 13.5%, 2011 में 8.5% और 2022 के जनगणना के अनुसार मात्र 7.95% रह गई।
पिछले 50 वर्षों में जहां कुल आबादी दोगुनी से ज्यादा हो गई, वहीं हिंदुओं की संख्या में करीब 75 लाख की कमी आई है। इसका मुख्य कारण लगातार उत्पीड़न, भूमि हड़पना, ब्लास्फेमी के झूठे आरोप और पलायन है। 1971 के मुक्ति संग्राम में पाकिस्तानी सेना ने हिंदुओं को निशाना बनाया, लाखों मारे गए या भागे। स्वतंत्र बांग्लादेश में भी यह सिलसिला नहीं रुका – अवामी लीग की शेख हसीना सरकार गिरने के बाद 2024-2025 में सैकड़ों मंदिरों पर हमले, घरों में आगजनी और लक्षित हत्याएं हुईं।
अब बड़ा सवाल: दीपू चंद्र दास जैसी बर्बर हत्याओं पर विश्व मीडिया और मानवाधिकार संगठन क्यों खामोश हैं? न्यूयॉर्क टाइम्स, बीबीसी या अल जजीरा ने बांग्लादेश की हिंसा को कवर किया, लेकिन हिंदू लिंचिंग को “अलग-थलग घटना” या “राजनीतिक अराजकता का हिस्सा” बताकर टाल दिया। वहीं, अगर कहीं मुस्लिम या ब्लैक कम्युनिटी पर हमला होता है – जैसे गाजा में इजरायली कार्रवाई, म्यांमार में रोहिंग्या संकट या अमेरिका में ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन – तो विश्व मीडिया तुरंत सक्रिय हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र, एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे संगठन बयान जारी करते हैं, प्रदर्शन होते हैं, बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक सेलिब्रिटी आवाज उठाते हैं। लेकिन हिंदू पीड़ितों के लिए ऐसी संवेदना क्यों नहीं?
यह दोहरा मापदंड क्यों? क्योंकि हिंदू उत्पीड़न की खबरें अक्सर “भारतीय प्रोपेगैंडा” या “हिंदुत्व की साजिश” कहकर खारिज कर दी जाती हैं। पश्चिमी मीडिया में हिंदू पीड़ितों को कम प्राथमिकता मिलती है, जबकि मुस्लिम या अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों को “इस्लामोफोबिया” या “नस्लवाद” का बड़ा मुद्दा बना दिया जाता है। बांग्लादेश में यूनुस सरकार को नोबेल विजेता होने के कारण आलोचना से बचाया जाता है। अगर हिंदू हमलों को बड़ा बनाया जाए, तो इसे “इस्लामोफोबिया” कहकर दबा दिया जाता है। परिणाम? हिंदू जीवन की कीमत कम आंकी जाती है। एक हिंदू की हत्या पर चुप्पी, जबकि मुस्लिम या ब्लैक पीड़ित पर विश्व एकजुट हो जाता है।
यह कहां ले जा रहा है हमें? अगर विश्व ऐसे दोहरे मानदंड अपनाता रहेगा, तो कट्टरपंथ बढ़ेगा। बांग्लादेश में हिंदू अगर 8% से और कम होते गए, तो एक दिन वहां हिंदू नामोनिशान मिट जाएगा – जैसे पाकिस्तान में हुआ, जहां 1947 में 23% हिंदू थे, अब मात्र 2%। यह सिर्फ बांग्लादेश की समस्या नहीं, बल्कि पूरी मानवता की है। एक जीवन की कीमत दूसरे से ज्यादा क्यों? मानवाधिकार सबके लिए समान होने चाहिए, चाहे पीड़ित हिंदू हो, मुस्लिम हो या कोई और।
विश्व को जागना होगा। अंतरराष्ट्रीय संगठनों को हिंदू उत्पीड़न पर बोलना चाहिए, मीडिया को निष्पक्ष कवरेज देनी चाहिए। भारत ने बार-बार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की चिंता जताई है, लेकिन अकेला काफी नहीं। अगर हम चुप रहे, तो ऐसी लिंचिंग दोहराई जाती रहेंगी। दीपू चंद्र दास की मौत हमें याद दिलाती है कि धार्मिक कट्टरता किसी समाज को बर्बाद कर देती है। बांग्लादेश को सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी, वरना “नया बांग्लादेश” सिर्फ एक खोखला नारा रह जाएगा। उम्मीद है, न्याय होगा और शांति लौटेगी – लेकिन इसके लिए विश्व की चुप्पी टूटनी होगी।
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बांग्लादेश में हिन्दू लिंचिंग — हिंदी रिपोर्ट
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