Netflix पर रिलीज़ हुई फिल्म ‘बारामुला’ (Baramulla) सिर्फ एक हॉरर फिल्म नहीं है यह कश्मीर की बर्फीली घाटियों में जमे दर्द, स्मृतियों और आत्माओं की कहानी है। निर्देशक आदित्य सुहास जांभले (Article 370 के निर्देशक) ने इस फिल्म में डर को एक सामाजिक अनुभव बना दिया है। मुख्य भूमिका में हैं मानव कौल, जिन्होंने अपने अभिनय से इस फिल्म को एक मनोवैज्ञानिक अनुभव बना दिया है।
यह फिल्म दर्शक को झकझोरती नहीं, धीरे-धीरे अंदर उतरती है, और वहीं बस जाती है।
कहानी: घाटी का एक अधूरा सच
फिल्म की कहानी डीएसपी रिदवान सैयद (मानव कौल) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्हें कश्मीर के बारामुला इलाके में भेजा जाता है वहाँ रहस्यमयी तरीके से बच्चे गायब हो रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे वह केस की तह तक जाते हैं, उन्हें एहसास होता है कि यह मामला सिर्फ अपराध का नहीं, सदियों पुराने जख्मों और आत्माओं के पुनर्जन्म का है।
उनकी पत्नी गुलनार (भाषा सुम्बली) और बेटी नूरी (अरिस्टा मेहता) कहानी में मानवीय भावनाओं की डोर हैं जहाँ एक तरफ भय है, वहीं दूसरी ओर पारिवारिक प्रेम की नर्मी।
फिल्म का असली जादू इस बात में है कि यहाँ “भूत” किसी डर का प्रतीक नहीं, बल्कि अतीत के न मिटे दर्द का रूप हैं।
अभिनय: मानव कौल ने फिर साबित किया क्यों वे अलग हैं
मानव कौल इस फिल्म की आत्मा हैं। उनका अभिनय नाटकीय नहीं आंतरिक, सधा हुआ और गहराई से मानवीय है। वे एक ऐसे इंसान को निभाते हैं जो बाहर से पुलिस अधिकारी है, लेकिन अंदर से टूटा हुआ पिता, अपराध-बोध से ग्रस्त इंसान।
भाषा सुम्बली, जो The Kashmir Files से चर्चित हुई थीं, यहाँ बेहद संतुलित और भावनात्मक अभिनय करती हैं।
उनकी आँखों में छिपा दर्द और यादें फिल्म के हर फ्रेम में महसूस होती हैं।
बेटी नूरी (अरिस्टा मेहता) का किरदार छोटा जरूर है, लेकिन उसकी मासूमियत इस अंधेरे माहौल को जीवंत कर देती है।
👉 कुल मिलाकर, कास्टिंग और अभिनय बारामुला को विश्वसनीय और गहराई से प्रभावशाली बनाते हैं।
सिनेमाटोग्राफी: कश्मीर की खूबसूरती में छिपा सन्नाटा
फिल्म की सिनेमाटोग्राफी Arnold Fernandes ने की है, और यह वाकई अद्भुत है। हर फ्रेम एक पेंटिंग जैसा लगता है: बर्फ से ढकी घाटियाँ, हल्की धुंध, लकड़ी के घर, और शांत गलियाँ मिलकर ऐसा माहौल बनाती हैं कि दर्शक खुद को वहीं महसूस करता है।
कैमरा बहुत धीरे चलता है, मानो डर को सीधे दिखाने की बजाय महसूस करवाना चाहता हो। रंगों का पैलेट (नीले, भूरे, सफेद टोन) फिल्म को ठंडक और रहस्य का एहसास देता है।
ध्वनि-डिज़ाइन (sound design) भी शानदार है — बर्फ पर कदमों की चरमराहट, दूर की अजान, खामोशी में किसी दरवाज़े का चरमराना — सब कुछ दर्शक को कहानी का हिस्सा बना देता है।
निर्देशन और पटकथा: संवेदनशीलता से लिपटा डर
निर्देशक आदित्य सुहास जांभले का काम यहां साहसी कहा जा सकता है। उन्होंने कश्मीर को “संघर्ष की भूमि” नहीं, बल्कि “आत्मा की भूमि” के रूप में दिखाया है।
कहानी का कथानक हॉरर और सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी का अनोखा मेल है। यह फिल्म बताती है कि हॉरर सिर्फ डराने के लिए नहीं, सोचने के लिए भी हो सकता है।
पहला आधा हिस्सा थोड़ा धीमा लगता है, लेकिन यह गति कहानी की गंभीरता से मेल खाती है। क्लाइमेक्स भावनात्मक है, झटका नहीं बल्कि एक सन्नाटा, जो क्रेडिट रोल के बाद भी दर्शक के भीतर बना रहता है।
प्रतीक और अर्थ: डर से परे एक दार्शनिक फिल्म
‘बारामुला’ में दिखाई गई आत्माएँ सिर्फ मृत नहीं, बल्कि वो जिंदा यादें हैं जो कश्मीर और उसके लोगों को अब भी सताती हैं। फिल्म यह दिखाती है कि कभी-कभी “डर” किसी अलौकिक चीज़ से नहीं, बल्कि अतीत से होता है जो मिटता नहीं, बस बदलता है।
यह फिल्म कश्मीर के विस्थापन, स्मृति और पहचान के सवालों को एक थ्रिलर में पिरो देती है।
संगीत और ध्वनि: सन्नाटे की एक लय
फिल्म का संगीत न्यूनतम है लेकिन वही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। कहीं धीमी लोरी, कहीं हवा में बजती बांसुरी, कहीं अचानक उतरता सन्नाटा सब कुछ कहानी का विस्तार बन जाता है।
कई बार संगीत के बजाय खामोशी ही सबसे प्रभावशाली संवाद बन जाती है।
क्या अच्छा लगा
✅ मानव कौल का गहराई से किया गया अभिनय
✅ कश्मीर की अद्भुत और रहस्यमयी सिनेमाटोग्राफी
✅ कहानी का भावनात्मक और प्रतीकात्मक पक्ष
✅ डर और संवेदना का संतुलित मिश्रण
✅ निर्देशक का परिपक्व दृष्टिकोण
क्या थोड़ा कमजोर लगा
❌ शुरुआती भाग थोड़ा धीमा चलता है
❌ कुछ हॉरर दृश्य अधूरे लगते हैं
❌ अंत थोड़ा अमूर्त है सबके लिए स्पष्ट नहीं
फिर भी, ये कमियाँ फिल्म की गहराई को कम नहीं करतीं।
अंतिम निर्णय: देखने योग्य अनुभव
‘बारामुला’ उन लोगों के लिए नहीं जो सिर्फ डरना चाहते हैं यह उन लोगों के लिए है जो सोचना, महसूस करना और याद रखना चाहते हैं।
यह एक ऐसी फिल्म है जो खत्म नहीं होती वह आपके भीतर चलती रहती है।
रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐ (4/5)
निष्कर्ष
‘बारामुला’ में कश्मीर सिर्फ एक जगह नहीं वह एक चरित्र है, जो सांस लेता है, दुखता है और याद करता है। यह फिल्म साबित करती है कि भारतीय सिनेमा अब सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव भी बन सक्ती है।
अगर आप Netflix पर कुछ अर्थपूर्ण और प्रभावशाली देखना चाहते हैं, तो ‘बारामुला’ जरूर देखें। यह फिल्म सिखाती है हर भूत डराने नहीं आता, कुछ बस सुने जाने की ख्वाहिश रखते हैं।




