भारत के प्रमुख त्यौहारों में से एक ‘मकर संक्रांति‘ को उत्तर भारत के कई हिस्सों में मुख्य रूप से ‘खिचड़ी पर्व‘ के नाम से जाना जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने के बाद खिचड़ी का दान करना और उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करना अनिवार्य माना गया है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस दिन केवल खिचड़ी ही क्यों खाई जाती है? इसके पीछे छिपे धार्मिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक कारणों को समझना अत्यंत रोचक है।
धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व: ग्रहों का संतुलन
शास्त्रों के अनुसार, खिचड़ी में इस्तेमाल होने वाली हर सामग्री का संबंध किसी न किसी विशेष ग्रह से है। यही कारण है कि इसे खाने से व्यक्ति की कुंडली के ग्रह शांत होते हैं:
- चावल (चंद्रमा): खिचड़ी का मुख्य आधार चावल है, जो चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है। यह मन की शांति और शीतलता प्रदान करता है।
- काली दाल (शनि): मकर संक्रांति पर विशेष रूप से काली उड़द की दाल की खिचड़ी बनाई जाती है। उड़द की दाल का संबंध शनि देव से है। सूर्य का अपने पुत्र शनि की राशि में प्रवेश होने के कारण इस दिन शनि देव को प्रसन्न करना शुभ होता है।
- हल्दी (बृहस्पति): सुनहरी हल्दी बृहस्पति देव (गुरु) का प्रतीक है, जो ज्ञान और समृद्धि लाती है।
- हरी सब्जियां (बुध): खिचड़ी में डाली जाने वाली मटर, गोभी और अदरक बुध ग्रह से संबंधित हैं।
- घी (सूर्य): खिचड़ी के ऊपर डाला जाने वाला शुद्ध देसी घी सूर्य और मंगल की ऊर्जा का प्रतीक है।
मान्यता है कि संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने से शरीर में ग्रहों का सकारात्मक संचार होता है और आने वाला पूरा वर्ष सुखमय बीतता है।
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→ पूरा लेख पढ़ेंपौराणिक कथा: बाबा गोरखनाथ से संबंध
कहा जाता है कि खिचड़ी की परंपरा की शुरुआत बाबा गोरखनाथ के समय से हुई थी। पौराणिक कथा के अनुसार, जब खिलजी के आक्रमण के समय योगी भोजन बनाने का समय नहीं निकाल पाते थे और भूखे रह जाते थे, तब बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जियों को एक साथ पकाकर एक पौष्टिक व्यंजन तैयार करने की सलाह दी। इस व्यंजन से योगियों को तुरंत ऊर्जा मिली और यह अत्यंत स्वादिष्ट भी लगा। बाबा गोरखनाथ ने ही इस व्यंजन का नाम ‘खिचड़ी’ रखा। तभी से मकर संक्रांति पर गोरखपुर के प्रसिद्ध मंदिर में खिचड़ी मेला लगता है और इसे प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
वैज्ञानिक और स्वास्थ्य लाभ
मकर संक्रांति का पर्व कड़ाके की ठंड के दौरान आता है। इस समय हमारे शरीर की जठराग्नि (पाचन शक्ति) को ऐसे भोजन की आवश्यकता होती है जो आसानी से पच जाए और शरीर को गर्माहट भी दे।
- पूर्ण आहार: खिचड़ी कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, विटामिन और फाइबर का एक संतुलित मिश्रण है।
- पाचन में आसान: यह पेट के लिए हल्की होती है और पाचन तंत्र को डिटॉक्स करने में मदद करती है।
- शरीर को गर्माहट: खिचड़ी में अदरक, काली मिर्च और घी का उपयोग ठंड से लड़ने की शक्ति देता है।
- ऊर्जा का स्रोत: दाल और चावल का संयोजन शरीर को लंबे समय तक ऊर्जावान बनाए रखता है।
मकर संक्रांति विशेष: पारंपरिक खिचड़ी बनाने की विधि
मकर संक्रांति की खिचड़ी अन्य दिनों की तुलना में थोड़ी खास होती है क्योंकि इसमें ताजी कटी सब्जियों और शुद्ध मसालों का भरपूर उपयोग किया जाता है।
सामग्री:
- 1 कप नए चावल (खुशबूदार)
- 1/2 कप काली उड़द की दाल (छिलके वाली)
- सब्जियां: मटर, फूलगोभी, गाजर, आलू (कटे हुए)
- मसाले: हल्दी, हींग, जीरा, अदरक-मिर्च का पेस्ट, तेज पत्ता
- घी और नमक स्वादानुसार
विधि:
- सबसे पहले दाल और चावल को अच्छी तरह धोकर 15-20 मिनट के लिए भिगो दें।
- एक कुकर या हांडी में 2 बड़े चम्मच घी गरम करें। इसमें हींग, जीरा और तेज पत्ता डालें।
- अब अदरक-मिर्च का पेस्ट डालें और सारी कटी हुई सब्जियां डालकर 2 मिनट तक भूनें।
- भीगे हुए दाल-चावल डालें और साथ में हल्दी व नमक मिलाएं।
- चावल की मात्रा का 3-4 गुना पानी डालें और 2-3 सीटी आने तक पकाएं।
- ऊपर से हरा धनिया और ढेर सारा देसी घी डालकर दही, पापड़ और अचार के साथ गरमा-गरम परोसें।
निष्कर्ष
मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि प्रकृति और स्वास्थ्य के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक तरीका है। यह हमें सिखाता है कि कैसे साधारण चीजों के मेल से एक असाधारण और ऊर्जावान जीवन जिया जा सकता है। इस 14 जनवरी 2026 को आप भी इस पारंपरिक व्यंजन का आनंद लें और दान के माध्यम से खुशियाँ बांटें।
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