भारत एक ऐसा देश है जिसकी आत्मा गांवों में बसती है और जिसकी धड़कन खेतों में सुनाई देती है। “जय जवान, जय किसान” का नारा केवल एक नारा नहीं, बल्कि इस राष्ट्र के अस्तित्व का मूल मंत्र है। हर साल 23 दिसंबर को हम ‘राष्ट्रीय किसान दिवस’ (Kisan Diwas) के रूप में मनाते हैं। यह दिन केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों अन्नदाताओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है जो हाड़ कंपाने वाली ठंड और झुलसा देने वाली गर्मी में हमारे लिए अनाज उगाते हैं।
इस वर्ष 2025 में, किसान दिवस का महत्व और भी बढ़ गया है क्योंकि हम एक ऐसे दौर में खड़े हैं जहाँ पारंपरिक कृषि और आधुनिक तकनीक का संगम हो रहा है। आइए, इस विशेष दिवस के इतिहास, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के योगदान और आज के परिप्रेक्ष्य में किसानों की स्थिति का गहराई से विश्लेषण करते हैं।
किसान दिवस का ऐतिहासिक आधार: चौधरी चरण सिंह की विरासत
राष्ट्रीय किसान दिवस भारत के पांचवें प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह (1902–1987) की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के एक किसान परिवार में जन्मे चौधरी चरण सिंह ने अपनी सादगी और किसानों के प्रति अपने समर्पण के कारण ‘किसानों के मसीहा’ के रूप में पहचान बनाई।
चौधरी चरण सिंह का योगदान:
उन्होंने बहुत करीब से किसानों की पीड़ा और जमींदारों के शोषण को देखा था। जब वे उत्तर प्रदेश के कृषि मंत्री और बाद में मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने ऐतिहासिक ‘जमींदारी उन्मूलन विधेयक’ पेश किया। उन्होंने पटवारी प्रणाली को सुधारा और किसानों को उनकी जमीन का असली हकदार बनाया। उनके प्रयासों से ही 1939 में ‘ऋण मोचन विधेयक’ पारित हुआ, जिसने गरीब किसानों को साहूकारों के चंगुल से मुक्त कराया।
भारत सरकार ने साल 2001 में उनके सम्मान में 23 दिसंबर को ‘राष्ट्रीय किसान दिवस’ घोषित किया। दिसंबर 2025 का यह दिन इसलिए भी खास है क्योंकि हाल ही में उन्हें प्रदान किया गया ‘भारत रत्न’ सम्मान देश के कृषि वर्ग के लिए एक बड़े गौरव का प्रतीक बन गया है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में किसानों की भूमिका
अक्सर लोग कृषि को केवल भोजन से जोड़कर देखते हैं, लेकिन यह भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। भारत की लगभग 50% से अधिक जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है।
- जीडीपी में योगदान: भले ही सेवा क्षेत्र का विस्तार हुआ हो, लेकिन भारत की जीडीपी में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों का योगदान अभी भी लगभग 18-20% है।
- खाद्य सुरक्षा: 140 करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना एक हिमालयी कार्य है, जिसे हमारे किसान बखूबी निभा रहे हैं।
- कच्चा माल: कपड़ा उद्योग से लेकर चीनी उद्योग और खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) तक, उद्योगों का एक बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादों पर टिका है।
आधुनिक युग में खेती की नई दिशा: तकनीक और नवाचार
2025 तक आते-आते भारतीय कृषि का चेहरा काफी बदल चुका है। अब किसान केवल हल-बैल तक सीमित नहीं हैं। ‘स्मार्ट फार्मिंग’ का दौर शुरू हो चुका है।
- ड्रोन तकनीक: उर्वरकों के छिड़काव और फसलों की निगरानी के लिए अब किसान ड्रोन का उपयोग कर रहे हैं। इससे न केवल समय की बचत हो रही है, बल्कि कीटनाशकों का सटीक उपयोग भी सुनिश्चित हो रहा है।
- जैविक खेती (Organic Farming): रसायन मुक्त खेती की मांग वैश्विक स्तर पर बढ़ी है। सिक्किम के बाद अब कई अन्य राज्य भी पूरी तरह से जैविक होने की ओर अग्रसर हैं।
- डिजिटल कृषि: ‘ई-नाम’ (e-NAM) जैसे पोर्टल्स के जरिए किसान अब अपनी फसल देश के किसी भी कोने में सही दाम पर बेच पा रहे हैं।
चुनौतियां और कड़वी सच्चाई
किसान दिवस मनाना तब तक सार्थक नहीं है जब तक हम उन चुनौतियों पर बात न करें जो आज भी एक किसान का पीछा नहीं छोड़तीं।
- जलवायु परिवर्तन: बेमौसम बारिश, बढ़ता तापमान और सूखे की स्थिति ने फसलों को अनिश्चित बना दिया है। 2025 में भी ‘क्लाइमेट रेजिलिएंट’ (जलवायु सहिष्णु) फसलों की कमी एक बड़ी चुनौती है।
- कर्ज का जाल: आज भी छोटे और सीमांत किसान कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं। संस्थागत ऋण (Institutional Credit) की पहुंच हर छोटे किसान तक नहीं हो पाई है।
- युवाओं का पलायन: खेती में बढ़ते जोखिम और कम मुनाफे के कारण ग्रामीण युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। हमें कृषि को एक ‘ग्लैमरस और मुनाफे वाले करियर’ के रूप में पेश करने की जरूरत है।
समाधान और आगे की राह
किसान दिवस 2025 पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम केवल प्रतीकात्मक पूजा न करें, बल्कि ठोस कदम उठाएं:
- मूल्य संवर्धन (Value Addition): किसानों को केवल फसल उगाने तक सीमित न रखकर उन्हें प्रसंस्करण इकाइयों से जोड़ना होगा ताकि वे सीधे बाजार में ‘ब्रांडेड’ उत्पाद बेच सकें।
- जल संरक्षण: ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ के मंत्र को हर खेत तक पहुँचाना होगा।
- शिक्षा: कृषि विश्वविद्यालयों के शोध को प्रयोगशालाओं से निकालकर सीधे किसानों के खेतों तक ले जाना होगा।
✅ निष्कर्ष
राष्ट्रीय किसान दिवस हमें याद दिलाता है कि मेज पर रखा भोजन किसी कारखाने में नहीं, बल्कि खून-पसीने से सींचे गए खेतों में पैदा होता है। चौधरी चरण सिंह का सपना था कि एक किसान का बेटा भी देश की नीतियों में बराबर का साझीदार हो। 2025 में भारत जब ‘विकसित भारत’ बनने की ओर बढ़ रहा है, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास की इस सीढ़ी में किसान सबसे पीछे न रह जाए।
आज के दिन आइए हम शपथ लें कि हम किसानों का सम्मान करेंगे, भोजन की बर्बादी रोकेंगे और कृषि को टिकाऊ बनाने में अपना सहयोग देंगे।
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