बांग्लादेश बनाम पाकिस्तान: हिंदू आबादी की गिरावट की दर्दनाक तुलना – एक जीवन की कीमत कितनी सस्ती हो गई?

बांग्लादेश बनाम पाकिस्तान: हिंदू आबादी की गिरावट की दर्दनाक तुलना – एक जीवन की कीमत कितनी सस्ती हो गई?

बांग्लादेश में इन दिनों हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमले और लिंचिंग की घटनाएं दुनिया की आंखों के सामने हैं, लेकिन चुप्पी क्यों? दीपू चंद्र दास जैसी बर्बर हत्याओं को देखकर सवाल उठता है कि क्या हिंदू जीवन की कीमत इतनी कम हो गई है कि विश्व समुदाय इसे नजरअंदाज कर देता है? लेकिन यह संकट नया नहीं है। अगर हम पाकिस्तान की ओर देखें, तो वहां हिंदू आबादी की गिरावट एक भयावह मिसाल है – जहां हिंदू लगभग नामोनिशान मिट चुके हैं। दोनों देशों की तुलना करें तो साफ होता है कि धार्मिक कट्टरता और राज्य की उदासीनता कैसे एक समुदाय को खत्म कर देती है।

पाकिस्तान में हिंदू आबादी का सफाया:

1941 की जनगणना (विभाजन से पहले) में वर्तमान पाकिस्तान के क्षेत्र (वेस्ट पाकिस्तान) में हिंदू 14.6% थे। विभाजन के दौरान हुई हिंसा और बड़े पैमाने पर पलायन के कारण लाखों हिंदू भारत आ गए। 1951 की जनगणना में यह गिरकर मात्र 1.6% रह गई। उसके बाद भी गिरावट जारी रही – ब्लास्फेमी के झूठे आरोप, जबरन धर्मांतरण, हिंदू लड़कियों का अपहरण और बलात्कार जैसी घटनाएं आम हो गईं।

  • 1998 जनगणना: 1.85%
  • 2017 जनगणना: लगभग 2%
  • 2023 जनगणना: 2.17% (करीब 52 लाख हिंदू)

यानी 75 सालों में हिंदू आबादी प्रतिशत में स्थिर या मामूली बढ़ोतरी के बावजूद, वास्तविक संख्या में बहुत कम वृद्धि हुई क्योंकि कुल आबादी कई गुना बढ़ गई। लेकिन कारण? हर साल 1000 हिंदू और क्रिश्चियन लड़कियां अपहरण का शिकार होती हैं, जबरन इस्लाम कबूल करवाया जाता है और शादी कर दी जाती है (ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान और अन्य रिपोर्ट्स के अनुसार)। मंदिरों पर हमले, भूमि हड़पना, नौकरियों में भेदभाव और ब्लास्फेमी कानून का दुरुपयोग – ये सब हिंदुओं को मजबूरन पलायन या छिपकर जीने पर मजबूर कर रहे हैं। 2024-2025 में भी हमले बढ़े हैं – हिंदू सफाई कर्मचारियों की हत्याएं, मंदिर तोड़े गए और जबरन धर्मांतरण के मामले दर्जनों आए। पाकिस्तान में हिंदू अब मुख्य रूप से सिंध प्रांत में सिमट गए हैं, जहां वे गरीबी और डर में जी रहे हैं।

बांग्लादेश में धीमी लेकिन निरंतर गिरावट:

बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) में स्थिति अलग लेकिन उतनी ही चिंताजनक है। 1941 में हिंदू 28% थे। 1951 में 22%, 1971 के मुक्ति संग्राम और पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों के बाद गिरावट तेज हुई (लाखों हिंदू मारे गए या भागे)।

  • 1974: 13.5%
  • 1981: 12.1%
  • 2001: 9.6%
  • 2011: 8.5%
  • 2022: 7.95% (करीब 1.31 करोड़ हिंदू)

यहां गिरावट धीमी है, लेकिन लगातार। कारण? 1971 के युद्ध के बाद भी मंदिरों पर हमले, भूमि हड़पना (वेस्टेड प्रॉपर्टी एक्ट का दुरुपयोग), ब्लास्फेमी के झूठे आरोप और सामुदायिक हिंसा। शेख हसीना सरकार गिरने के बाद 2024-2025 में हमले बढ़े – सैकड़ों मंदिर जलाए गए, घर लूटे गए और दीपू चंद्र दास जैसी लिंचिंग हुईं। हिंदू आबादी अब 8% से कम है, और पलायन जारी है।

तुलना: पाकिस्तान में तेज सफाया, बांग्लादेश में धीमा खात्मा

पाकिस्तान में विभाजन के तुरंत बाद हिंदू आबादी 14.6% से 1.6% हो गई – एक झटके में सफाया। उसके बाद जबरन धर्मांतरण और अपहरण ने उन्हें नाममात्र का बना दिया। आज पाकिस्तान में हिंदू 2.17% हैं – एक दिन शायद 1% से कम हो जाएं। बांग्लादेश में गिरावट धीमी लेकिन निरंतर – 28% से 8% तक। दोनों में समानता है: कट्टरपंथी ताकतें, राज्य की कमजोर कानून व्यवस्था और विश्व की चुप्पी।

अगर पाकिस्तान की मिसाल देखें तो बांग्लादेश का भविष्य डरावना है। वहां भी हिंदू एक दिन नामोनिशान मिट सकते हैं। दीपू चंद्र दास की लिंचिंग कोई अलग घटना नहीं – यह उस संकट की शुरुआत है जो पाकिस्तान में दशकों से चल रहा है। विश्व मीडिया मुस्लिम या अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों पर तो हंगामा करता है, लेकिन हिंदू पीड़ितों पर चुप क्यों? क्योंकि हिंदू उत्पीड़न को “भारतीय प्रोपेगैंडा” कहकर खारिज कर दिया जाता है।

यह हमें कहां ले जा रहा है? अगर ऐसे दोहरे मापदंड जारी रहे, तो दक्षिण एशिया में हिंदू अल्पसंख्यक पूरी तरह मिट जाएंगे। एक जीवन की कीमत दूसरे से कम क्यों? मानवाधिकार सबके लिए समान होने चाहिए। बांग्लादेश और पाकिस्तान दोनों को अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी, वरना इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। दीपू चंद्र दास और पाकिस्तान के लाखों गुमनाम हिंदू पीड़ित हमें चेतावनी दे रहे हैं – जागो, वरना बहुत देर हो जाएगी।

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बांग्लादेश में हिन्दू लिंचिंग — हिंदी रिपोर्ट

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