उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में रहने वाली माया की दुनिया घर की चारदीवारी और रसोई के धुएं तक सीमित थी। समाज के बनाए नियम साफ थे—लड़कियाँ पढ़ लें तो ठीक, पर घर की दहलीज लांघकर ‘पुरुषों वाले काम’ नहीं कर सकतीं।
संघर्ष की शुरुआत
माया के पति का अचानक देहांत हो गया। सहानुभूति देने वालों की कमी नहीं थी, लेकिन मदद का हाथ किसी ने नहीं बढ़ाया। दो बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च माया के कंधों पर था। लोग चाहते थे कि वह सिलाई-कढ़ाई करे या किसी के घर में काम करे, पर माया की आँखों में कुछ और ही था।
उसके पिता की एक पुरानी मैकेनिक की दुकान थी, जो सालों से बंद पड़ी थी। माया ने फैसला किया कि वह उस दुकान को फिर से खोलेगी।
विरोध और तंज
जब माया ने पहली बार दुकान का शटर उठाया, तो पूरे मोहल्ले में कानाफूसी होने लगी।
- “अब औरतें भी गाड़ियाँ ठीक करेंगी?”
- “हाथ काले करोगी तो बच्चों को क्या सिखाओगी?”
- “ये मर्दों का काम है, तुम्हारे बस का नहीं।”
माया ने इन बातों को अनसुना कर दिया। उसने ग्रीस और इंजन ऑयल से अपने हाथ सान लिए। उसने सीखा कि कैसे इंजन की धड़कन पहचानते हैं और कैसे टूटे हुए पुर्जों को नई जिंदगी देते हैं।
कामयाबी का मोड़
शुरुआत में कोई ग्राहक नहीं आता था। लेकिन एक दिन, कस्बे के सबसे बड़े व्यापारी की कार बीच सड़क पर खराब हो गई। कोई मैकेनिक नहीं मिल रहा था। हार मानकर वे माया की दुकान पर आए। माया ने अपनी कुशलता से मात्र 20 मिनट में वह खराबी ठीक कर दी जिसे बड़े-बड़े मैकेनिक नहीं समझ पा रहे थे।
व्यापारी ने खुश होकर उसे इनाम देना चाहा, लेकिन माया ने स्वाभिमान के साथ कहा:
“साहब, मुझे इनाम नहीं, काम चाहिए। आप बस दूसरों को बता दीजिएगा कि यहाँ गाड़ियाँ ठीक होती हैं।”
एक नई पहचान
धीरे-धीरे माया की दुकान पर भीड़ लगने लगी। उसकी ईमानदारी और हुनर ने लोगों के मुँह बंद कर दिए। आज माया केवल एक मैकेनिक नहीं है, बल्कि वह कस्बे की ‘मोटर-दीदी’ के नाम से मशहूर है। उसने अपने साथ दो और बेसहारा महिलाओं को काम सिखाया है और उन्हें आत्मनिर्भर बनाया है।
सीख
हुनर का कोई जेंडर नहीं होता। समाज चाहे कितनी भी दीवारें खड़ी कर दे, अगर इरादे फौलादी हों, तो हर बेड़ी तोड़ी जा सकती है। RealShePower केवल एक नाम नहीं, बल्कि हर उस महिला की हकीकत है जो अपनी तकदीर खुद लिखना जानती है।




