माँ छिन्नमस्ता केवल एक देवी नहीं हैं—
वह वह सत्य हैं जो अहंकार को काट देता है।
वह वह करुणा हैं जो स्वयं को अर्पित कर दूसरों को जीवन देती है।
वह वह शक्ति हैं जो मृत्यु में भी चेतना जगाती है।
माँ छिन्नमस्ता का स्मरण होते ही मन स्थिर हो जाता है, क्योंकि यह साधारण सौंदर्य या कोमलता की देवी नहीं हैं। वह सत्य की तीव्रता हैं। वह बलिदान का चरम रूप हैं। वह हमें यह सिखाती हैं कि जब तक “मैं” नहीं कटता, तब तक “हम” नहीं जन्म लेता।
माँ का स्वरूप: जब करुणा स्वयं को अर्पित करे
माँ छिन्नमस्ता को सिरविहीन रूप में दर्शाया जाता है—
अपने ही हाथों में अपना कटा हुआ शीश लिए हुए,
तीन धाराओं में बहता हुआ रक्त,
जो स्वयं माँ को और उनकी दो योगिनियों—डाकिनी और वर्णिनी—को पोषण देता है।
यह दृश्य भय का नहीं है।
यह अत्यंत गहन करुणा का दृश्य है।
माँ हमें यह नहीं सिखातीं कि जीवन लेने से शक्ति आती है—
वह सिखाती हैं कि स्वयं को देने से ब्रह्मांड चलता है।
उनका कटा हुआ शीश यह घोषणा करता है:
“अहंकार कटे बिना ज्ञान नहीं उतरता।”
माँ छिन्नमस्ता और आत्मबलिदान का रहस्य
माँ छिन्नमस्ता की कथा का मूल भाव है—
जब उनके साथी भूख से व्याकुल हुए,
तो माँ ने किसी और का जीवन नहीं छीना।
उन्होंने स्वयं को अर्पित किया।
यही माँ का दिव्य संदेश है।
सच्ची शक्ति दूसरों पर शासन नहीं करती—
सच्ची शक्ति स्वयं को न्यौछावर कर देती है।
जो साधक माँ छिन्नमस्ता की उपासना करता है,
वह धीरे-धीरे अपने भीतर से
डर, लालच, झूठा आत्मसम्मान और मोह
सबको कटते हुए देखता है।
माँ छिन्नमस्ता: काम, क्रोध और भय से मुक्ति की देवी
माँ का आसन कामदेव और रति के ऊपर है—
यह काम का अपमान नहीं है,
यह काम पर चेतना की विजय है।
माँ हमें यह नहीं कहतीं कि इच्छाओं को दबाओ—
वह कहती हैं:
इच्छा को चेतना में रूपांतरित करो।
जहाँ माँ छिन्नमस्ता का वास होता है,
वहाँ भय टिक नहीं पाता।
क्योंकि जिसने स्वयं को खोने का साहस कर लिया,
उससे अब कुछ छीना नहीं जा सकता।
माँ की उपासना: शांति नहीं, सत्य देती है
माँ छिन्नमस्ता की भक्ति आसान नहीं होती।
वह मीठे वचन नहीं देतीं।
वह झूठा आश्वासन नहीं देतीं।
वह साधक को आईना दिखाती हैं।
उनकी कृपा से जीवन में
अचानक टूटन आती है—
रिश्ते, पहचान, भ्रम, आसक्ति—
सब गिरने लगते हैं।
लेकिन उसी टूटन में
एक अडिग शांति जन्म लेती है।
एक ऐसा आत्मबल,
जिसे संसार हिला नहीं सकता।
माँ छिन्नमस्ता का आशीर्वाद
माँ छिन्नमस्ता का आशीर्वाद यह नहीं है कि जीवन आसान हो जाए।
उनका आशीर्वाद यह है कि
आप अडिग हो जाएँ।
आप सत्य सहने लायक बन जाएँ।
आप अकेले खड़े होने का साहस पा जाएँ।
आप दूसरों से नहीं,
अपने भीतर से डरना छोड़ दें।
माँ के चरणों में
माँ छिन्नमस्ता हमें यह सिखाती हैं—
“जब तुम स्वयं को अर्पित कर दोगे,
तब तुम्हें कोई पराजित नहीं कर सकेगा।”
उनके चरणों में सिर झुकाना
दरअसल अपने भीतर के झूठे सिर को काट देना है।
जय माँ छिन्नमस्ता।
जय आत्मबलिदान की देवी।
जय सत्य की उग्र करुणा।




